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कछार में मणिपुरी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा गरम, समाजसेवी बिजेन सिंह ने उठाई आवाज

बोरखोला से भाजपा टिकट की उम्मीद में लक्षी बाबू सिंह, लखीपुर से कांग्रेस नामांकन के इच्छुक डॉ. माइमोम सान्ति कुमार


असम में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कछार जिले के मणिपुरी समुदाय के बीच राजनीतिक आकांक्षाएं तेज होती दिखाई दे रही हैं। लंबे समय से पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।

लक्षी बाबू सिंह ने बोरखोला विधानसभा क्षेत्र से भाजपा का टिकट पाने की इच्छा जताई है। उनकी संभावित उम्मीदवारी ने मणिपुरी समुदाय के बीच विशेष रुचि पैदा की है। कई लोगों का मानना है कि यदि उन्हें प्रत्याशी बनाया जाता है, तो असम विधानसभा में इस समुदाय की आवाज और मजबूत हो सकती है।

दूसरी ओर, डॉ. माइमोम सान्ति कुमार लखीपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस का नामांकन चाहते हैं। उनका यह कदम विभिन्न राजनीतिक दलों के माध्यम से समुदाय की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी का संकेत देता है।

समाजसेवी बिजेन सिंह का कहना है कि बराक घाटी के विभिन्न इलाकों में उल्लेखनीय जनसंख्या होने के बावजूद मणिपुरी समुदाय को विधानसभा में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय से राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने के बावजूद उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति के स्तर पर इस समुदाय की उपेक्षा होती रही है, जो भविष्य में व्यापक राजनीतिक भागीदारी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

कई लोगों का मानना है कि यदि प्रमुख राजनीतिक दल समुदाय के भीतर से उम्मीदवार चुनते हैं, तो आगामी चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

बोरखोला और लखीपुर — दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों में मणिपुरी समुदाय की उल्लेखनीय जनसंख्या है, जिससे प्रतिनिधित्व का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि उपेक्षित या कम प्रतिनिधित्व वाले समूह से विश्वसनीय उम्मीदवार दिया जाता है, तो इसका असर जमीनी स्तर पर संगठन और मतदाता उपस्थिति पर पड़ सकता है।

हालांकि स्थानीय निवासी सतर्क आशावाद व्यक्त कर रहे हैं। पिछली चुनावों में प्रतिनिधित्व के वादे किए गए थे, लेकिन वे वास्तविकता में नहीं बदल पाए। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल केवल आश्वासन तक सीमित रहेंगे या वास्तव में अवसर प्रदान करेंगे?

उम्मीदवार चयन प्रक्रिया के दौरान कछार का मणिपुरी समुदाय स्थिति पर नजर बनाए हुए है। प्रमुख दलों के फैसलों से ही स्पष्ट होगा कि वे प्रतिनिधित्व के मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

फिलहाल जनमत का संदेश साफ है — चाहे जो भी दल सरकार बनाए, उपेक्षित इस समुदाय के विकास और उचित भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, जिसमें असम विधानसभा में एक प्रतिनिधित्वपूर्ण सीट सुनिश्चित करना भी शामिल है।

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